
देश
87 वर्ष की आयु में, 111 दिन के अनशन के बाद, अत्यधिक कमज़ोरी के कारण निधन हो गया
शेयर करें:
गुरु दास अग्रवाल, जिन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद या संत स्वामी सानंद के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म 20 जुलाई 1932 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले के कांधला गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा वहीं से पूरी की और बाद में University of Roorkee (जो अब IIT Roorkee है) से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। उन्होंने 1950 के दशक में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में डिज़ाइन इंजीनियर के रूप में अपना करियर शुरू किया, और दिलचस्प बात यह है कि बाद में बांधों के कट्टर विरोधी बनने के बावजूद, इसी दौर में वे टिहरी बांध के निर्माण से भी जुड़े रहे। इसके बाद वे IIT कानपुर में सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर बने और वहाँ दशकों तक विभाग के प्रमुख रहे। जब भारत सरकार ने उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी 1974 में Central Pollution Control Board की स्थापना की, तो अग्रवाल इसके पहले मेंबर-सेक्रेटरी नियुक्त हुए, जो पद उन्होंने 1979 से 1980 तक संभाला। वे रुड़की में पर्यावरण इंजीनियरिंग के विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहे और बाद में Envirotech Instruments नामक फर्म में पर्यावरण सलाहकार के रूप में भी काम किया।
गंगा के लिए उनका आंदोलन 1970 के दशक से शुरू हुआ और करीब चार दशकों तक चला, जो पूरी तरह वैज्ञानिक शोध पर आधारित था, केवल भावनात्मक अपील पर नहीं। उनका मुख्य ज़ोर गंगा की "अविरल धारा" पर था उनका मानना था कि गंगा की विशेष आत्म-शुद्धिकरण क्षमता केवल पानी से नहीं, बल्कि उसके तलछट (sediments) और पूरे नदी बेसिन की पारिस्थितिकी से आती है। वे बाद में UPA सरकार के अधीन National Ganga River Basin Authority के सदस्य भी बने, लेकिन 2012 में यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि यह संस्था दिखावटी और अप्रभावी है।
उनका सबसे चर्चित आंदोलन 2008 में शुरू हुआ, जब केंद्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी, जबकि उत्तराखंड राज्य में भाजपा की सरकार थी पहले मुख्यमंत्री बी.सी. खंडूरी और बाद में रमेश पोखरियाल निशंक के नेतृत्व में। उस समय गंगा की प्रमुख सहायक नदी भागीरथी के 125 किलोमीटर लंबे अछूते हिस्से पर छह जलविद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित या निर्माणाधीन थीं, जिनमें लोहारीनाग पाला, पाला मनेरी और भैरोंघाटी परियोजनाएं शामिल थीं। अग्रवाल ने 14 अप्रैल 2008 को सरकार को पत्र लिखकर भागीरथी के संरक्षण के लिए अनशन करने की मंशा जताई, और 22 जून 2008 को अपना पहला अनशन शुरू किया। 19 जून को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने दो बांधों का निर्माण रोकने की घोषणा की, लेकिन दो दिन बाद राज्य सरकार ने उन्हें ज़बरन इलाके से हटाकर दिल्ली भेज दिया, जहाँ से उन्होंने अपना विरोध जारी रखा। 30 जून को, अनशन के 18वें दिन, उन्होंने सरकार से लिखित आश्वासन मिलने पर अनशन तोड़ा कि छह में से दो बांधों पर काम रोका जाएगा और उनके प्रभाव की जांच के लिए एक समिति बनाई जाएगी।
जब छह महीने बाद भी सरकार ने अपना वादा पूरा नहीं किया, तो अग्रवाल ने 15 जनवरी 2009 को फिर से अनशन शुरू किया, इस बार तीसरी परियोजना लोहारीनाग पाला जलविद्युत परियोजना को रोकने की मांग के साथ। इस अनशन के 38वें दिन उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई थी। 19 फरवरी 2009 को, तब भी मनमोहन सिंह सरकार के अधीन, केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने उन्हें पत्र लिखकर लोहारीनाग पाला परियोजना पर काम तुरंत रोकने की पुष्टि की, जिसके बाद अगली सुबह अग्रवाल ने अनशन तोड़ दिया। यह एक बड़ी जीत थी क्योंकि उस परियोजना का करीब 40 प्रतिशत काम पहले ही पूरा हो चुका था और NTPC द्वारा इस पर करीब ₹1,000 करोड़ खर्च किए जा चुके थे। इसी दौर में, नवंबर 2008 में, गंगा को औपचारिक रूप से भारत की "राष्ट्रीय नदी" भी घोषित किया गया। इन वादों के बावजूद, 2010 की गर्मियों में तीसरे बांध पर निर्माण जारी रहा, जिसके चलते अग्रवाल ने जुलाई 2010 के मध्य में एक और भूख हड़ताल शुरू की। यह अनशन 31 दिन तक चला और तभी समाप्त हुआ जब सरकार ने इस तीसरे बांध को भी रद्द करने का फैसला लिया। इस दौरान तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने UPA सरकार की ओर से व्यक्तिगत रूप से हरिद्वार जाकर अग्रवाल से बातचीत की, और इन लगातार आंदोलनों के परिणामस्वरूप भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन अधिसूचित किया गया।
जुलाई 2011 में, 79 वर्ष की आयु में, अग्रवाल ने सांसारिक जीवन त्यागकर हिंदू संन्यास ग्रहण किया और स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद नाम धारण किया। वे 1905 में मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित गंगा महासभा के संरक्षक (patron) भी रहे। 2012 में, जब केंद्र में अब भी UPA सरकार थी और उत्तराखंड में कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार थी, अग्रवाल ने एक और अनशन किया जो लगभग ढाई महीने तक चला, जिसमें उन्होंने नदी संरक्षण के लिए मज़बूत कानून बनाने पर दबाव बनाना जारी रखा।
उनका आखिरी और घातक अनशन 22 जून 2018 को उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित मात्रि सदन आश्रम से शुरू हुआ। इस समय तक भारत की राजनीतिक तस्वीर काफी बदल चुकी थी केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा गठबंधन (NDA) सरकार थी, जिसमें नितिन गडकरी जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय संभाल रहे थे, जबकि उत्तराखंड में भी भाजपा की ही सरकार थी, जिसके मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत थे। इस बार अग्रवाल की मांगें थीं गंगा संरक्षण प्रबंधन अधिनियम पारित किया जाए, अलकनंदा और मंदाकिनी सहायक नदियों पर सभी जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह रोकी जाएं, और गंगा को वाकई "अविरल-निर्मल" बनाने के ठोस कदम उठाए जाएं जबकि सरकार का ध्यान नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत मुख्यतः सफाई पर केंद्रित था। उन्होंने साल भर में प्रधानमंत्री मोदी को कम से कम तीन पत्र लिखे, चेतावनी देते हुए कि अगर 22 जून 2018 (गंगा दशहरा) तक कोई कार्रवाई नहीं हुई तो वे आमरण अनशन शुरू कर देंगे। अनशन के 19वें दिन, उत्तराखंड पुलिस ने उन्हें ज़बरन उनके अनशन स्थल से हटाकर एम्स ऋषिकेश पहुंचाया; उन्होंने इस ज़बरन हटाए जाने को उत्तराखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसने फैसला दिया कि उन्हें अस्पताल तभी ले जाया जाए जब उनकी सेहत सच में खतरे में हो। 13 अगस्त को, अनशन के 53वें दिन, स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें फिर से एम्स में भर्ती कराया गया। उस समय हरिद्वार से सांसद रहे रमेश पोखरियाल निशंक ने सरकार की ओर से उनसे बातचीत की, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका। 10 अक्टूबर को, 109 दिनों तक सिर्फ शहद और दूध पर जीवित रहने के बाद, अग्रवाल ने वह भी छोड़ दिया और पानी लेने से भी इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि उनकी IV ड्रिप हटाई जाए, और ज़बरदस्ती अस्पताल में भर्ती रखे जाने को उन्होंने अपने नागरिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। जन आक्रोश की आशंका को देखते हुए, हरिद्वार के जिलाधिकारी ने उन्हें कनखल स्थित आश्रम से ऋषिकेश के सरकारी अस्पताल भेज दिया। 11 अक्टूबर 2018 को, 87 वर्ष की आयु में, 111 दिन के अनशन के बाद, अत्यधिक कमज़ोरी के कारण हुए हृदयाघात से गुरु दास अग्रवाल का एम्स ऋषिकेश में निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद उनके करीबी सहयोगी स्वामी दयानंद ने आरोप लगाया कि यह एक सुनियोजित साज़िश थी और उन्होंने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया, हालांकि सरकार ने इस आरोप को खारिज किया। जल पुरुष और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने पहले ही गंभीर चिंता जताई थी कि उनकी जान खतरे में है और प्रशासन तत्परता से काम नहीं कर रहा। अग्रवाल की मृत्यु ने हिमालयी राज्यों में जलविद्युत विकास और नदी संरक्षण के बीच के अनसुलझे टकराव, और गंगा की सफाई व पुनरुद्धार को लेकर सरकार के वादों और वास्तविक कार्रवाई के बीच के अंतर की ओर एक बार फिर ध्यान खींचा।
